यह कहानी एक ऐसे मूर्तिकार की है, जो हमें सिखाती है कि सफलता केवल मेहनत से नहीं, बल्कि दृढ़ता (Persistence) से मिलती है।
पत्थर की चोट (The Sculptor and the Stone)
एक बार एक मूर्तिकार (Sculptor) जंगल से गुजर रहा था। उसे एक बहुत ही सुंदर और बड़ा पत्थर दिखा। उसने सोचा, "क्यों न इस पत्थर से भगवान की एक प्रतिमा बनाई जाए?"
उसने अपना छैनी और हथौड़ा निकाला और जैसे ही पत्थर पर पहली चोट मारी, पत्थर से आवाज़ आई— "रुको! मुझे मत मारो, मुझे बहुत दर्द हो रहा है। मुझे छोड़ दो!"
मूर्तिकार दयालु था, उसने उस पत्थर को छोड़ दिया और आगे बढ़ गया। थोड़ी दूर जाने पर उसे एक और वैसा ही पत्थर मिला। उसने फिर से औजार उठाए और तराशना शुरू किया। इस पत्थर को भी दर्द हुआ, लेकिन वह चुप रहा।
कुछ दिनों की मेहनत के बाद, मूर्तिकार ने उस पत्थर को एक अद्भुत प्रतिमा (Statue) में बदल दिया।
नतीजा (The Result)
गाँव के लोग वहाँ एक मंदिर बना रहे थे और उन्हें एक मूर्ति की जरूरत थी। वे उस प्रतिमा को ले गए और मंदिर में स्थापित कर दिया। अब पूजा के लिए एक और पत्थर की जरूरत थी जिस पर लोग नारियल फोड़ सकें। वे जंगल गए और उसी पहले पत्थर को उठा लाए जिसने दर्द सहने से मना कर दिया था।
अब स्थिति यह थी:
पहला पत्थर (जिसने दर्द नहीं सहा): वह मंदिर के बाहर रखा गया, जहाँ हर रोज लोग उस पर जोर से नारियल फोड़ते थे।
दूसरा पत्थर (जिसने दर्द सहा): वह मंदिर के अंदर भगवान के रूप में पूजा जा रहा था।
सीख (Moral of the Story)
"अगर आज आप मेहनत के दर्द को नहीं सहेंगे, तो जिंदगी भर दूसरों की 'चोट' सहनी पड़ेगी।"
संघर्ष (Struggle) ही वह चीज़ है जो एक साधारण इंसान को 'खास' बनाती है। यदि आप आज मुश्किलों से भाग रहे हैं, तो आप अपनी चमक खो रहे हैं।